नवरात्रों में सांझी माता की पूजा का होता है बड़ा महत्व
महिलाएं घर की दीवार पर देवी मां की प्रतिमा बनाती है, जिसमें सेलखड़ी अन्य देशी रंग भरे जाते है। उसके श्रृंगार के लिए आटे की लोई बनाकर उससे चमकीले कागजों को चिपकाकर सांझी माता के कपड़े व अन्य आभूषणों को दर्शाया जाता है।
नवरात्रों में सांझी पूजा का बड़ा महत्व है। महिलाएं घर की दीवार पर देवी मां की प्रतिमा बनाती है, जिसमें सेलखड़ी अन्य देशी रंग भरे जाते है। उसके श्रृंगार के लिए आटे की लोई बनाकर उससे चमकीले कागजों को चिपकाकर सांझी माता के कपड़े व अन्य आभूषणों को दर्शाया जाता है। सांझी का निर्माण भी चूल्हे वाली पीली मिट्टी से होता है।
नवरात्र के पहले दिन महिलाएं सांझी के सामने दीप जलाकर व्रत की शुरुआत करती है। महिलाएं सांझी के सामने एकत्र होकर ‘सांझी-सांझी जै लै, सांझी मांगे घी बातौ कहां से लाऊं मैं घियौ बातौ’ कैसी बैठी विकट पहाड़ों में, जय दुर्गे महारानी, जैसे लोकगीतों को गाकर माता की स्तुति कर भोग लगाती है। पूरे नौ दिनों तक नवरात्रों के दौरान यही क्रम चलता रहता है। अंतिम नवरात्र को भोजन बनाकर छोटी-छोटी कन्याओं को माता के रूप में पूजा अर्चन करके भोग लगाते हैं और उनके चरण स्पर्श करके उनसे आशीर्वाद प्राप्त करती हैं फिर शाम के समय सांझी को उतारकर गांव के तालाब में या नदी में प्रवाहित करती हैंनवरात्रि के प्रथम दिन मां शैलपुत्री की पूजा होती है। शैलीपुत्री हिमालय की पुत्री हैं। इसी वजह से मां के इस स्वरूप को शैलपुत्री कहा जाता है। इनकी आराधना से हम सभी मनोवांछित फल प्राप्त कर सकते हैं। मां शैलपुत्री का प्रसन्न करने के लिए यह ध्यान मंत्र जपना चाहिए। इसके प्रभाव से माता जल्दी ही प्रसन्न होती हैं और भक्त की सभी कामनाएं पूर्ण करती हैं।


