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Kerala School Hijab Controversy ने शिक्षा, धर्म और राजनीति के बीच के टकराव को एक बार फिर उजागर कर दिया

इस वर्ष जून में 48 वर्षीय अनस नैना ने अपनी सबसे छोटी बेटी का दाखिला अपने घर के पास एक स्कूल में करवाया तो उनका उद्देश्य सिर्फ शिक्षा ही नहीं, बल्कि उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करना भी था। उनकी 13 वर्षीय बेटी आठवीं कक्षा में एर्नाकुलम के पल्लुरुथी में स्थित सेंट रिटा पब्लिक स्कूल में शामिल हुई। अनस ने यह निर्णय इसलिए लिया कि उनके पिछले स्कूल तक का रास्ता असुरक्षित था। CBSE मान्यता प्राप्त और लैटिन कैथोलिक चर्च द्वारा संचालित यह स्कूल उनके घर से मात्र 300 मीटर की दूरी पर था। लेकिन अक्टूबर में हुई एक घटना ने उनकी सबसे छोटी बेटी को मानसिक तनाव और पीड़ा में डाल दिया।

हम आपको बता दें कि यह विवाद 13 वर्षीय छात्रा और स्कूल के बीच हिजाब पहनने को लेकर शुरू हुआ, लेकिन जल्द ही यह केवल व्यक्तिगत मसला नहीं रहकर केरल में धर्म और राजनीति के बीच गहरी दरारों को उजागर करने वाला सांप्रदायिक मुद्दा बन गया। 7 अक्टूबर को स्कूल में वार्षिक आर्ट्स डे आयोजित था। छात्रा ने सोचा कि स्कूल में औपचारिक कक्षाएं नहीं होंगी और उसने अपनी यूनिफ़ॉर्म के साथ हिजाब की तरह एक शॉल पहनकर स्कूल में प्रवेश किया। एक शिक्षक ने कथित तौर पर उसे डांटा और उसके पिता को बुलाया गया। अनस ने कहा कि उन्हें स्कूल के हिजाब प्रतिबंध के बारे में जानकारी नहीं थी।

स्कूल पहुंची अनस का सामना न केवल शिक्षकों और प्रबंधन से हुआ, बल्कि पीटीए अध्यक्ष जोशी कैथवलपिल ने भी बातचीत में भाग लिया। अनस का आरोप है कि इस दौरान पीटीए अध्यक्ष ने मामले को सांप्रदायिक रंग दे दिया। 10 अक्टूबर को अनस ने बेटी को फिर से शॉल पहनकर स्कूल भेजा। इस बार विद्यालय प्रबंधन, पीटीए अध्यक्ष और माता-पिता के बीच विवाद और बढ़ गया। स्कूल की प्रिंसिपल सिस्टर हेलेना का कहना था कि अनस ने कुछ अन्य लोगों के साथ मिलकर शोरगुल किया और लाइव वीडियो बनाने लगे।

 

मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक पीटीए अध्यक्ष जोशी कैथवलपिल के सोशल मीडिया पोस्ट यह संकेत देते हैं कि वह एक दक्षिणपंथी ईसाई संगठन CASA के समर्थक हैं। साथ ही, वह राष्ट्रीय जनता पार्टी (NPP) के एर्नाकुलम जिला महासचिव भी हैं। इस घटना ने स्पष्ट रूप से दिखा दिया कि कैसे स्थानीय स्कूल के मामूली नियम विवाद राजनीतिक और सांप्रदायिक टकराव का माध्यम बन सकते हैं।

 

यह विवाद मीडिया और सोशल मीडिया के माध्यम से पूरे राज्य में फैल गया। SDPI और CASA जैसे संगठन, जो पहले अलग-अलग मुद्दों के लिए सक्रिय थे, इस मसले में एक-दूसरे पर आरोप लगाने लगे। स्कूल द्वारा 13 और 14 अक्टूबर को दो दिन की छुट्टी घोषित करना और पुलिस सुरक्षा की मांग ने विवाद को और हवा दे दी।

 

उधर, राज्य के शिक्षा मंत्री वी शिवनकुट्टी ने शुरू में कहा कि स्कूल की यूनिफ़ॉर्म छिपाने वाली कोई भी चीज अनुमति नहीं हो सकती। हालांकि बाद में उन्होंने आदेश दिया कि छात्रा हिजाब पहन सकती है और उप शिक्षा निदेशक से जांच भी करवाई। जांच में पाया गया कि स्कूल नियमों में हिजाब पर प्रतिबंध नहीं था और प्रिंसिपल की कार्रवाई शिक्षा के अधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन थी। इस विवाद पर IUML ने भी टिप्पणी की और इसे “धार्मिक तुष्टिकरण का मामला” बताया। जब यह मामला अदालत पहुँचा तो केरल सरकार ने उच्च न्यायालय में कहा कि एक मुस्लिम लड़की को स्कूल में हिजाब पहनने की इजाजत न देना उसकी निजता और गरिमा पर हमला है तथा उसे ‘धर्मनिरपेक्ष शिक्षा के उसके अधिकार से इंकार’ करना है। राज्य सरकार ने कहा कि लड़की का अपने घर में और घर के बाहर हिजाब पहनने का अधिकार,‘विद्यालय के द्वार पर खत्म नहीं हो जाता है।’ ये बातें एक हलफनामे में कही गई हैं, जो पल्लुरुथी में चर्च संचालित ‘सेंट रीटा पब्लिक स्कूल’ की एक याचिका के जवाब में दायर किया गया था।

 

इस याचिका में सामान्य शिक्षा विभाग के उस निर्देश को चुनौती दी गई थी जिसमें मुस्लिम लड़की को ‘हिजाब’ पहनकर कक्षा में जाने की इजाज़त दी गई थी। विद्यालय ने विभाग के नोटिस को भी चुनौती दी थी, जिसमें कहा गया था कि शिक्षण संस्थान में ‘गंभीर गड़बड़ी’ है। जब शुक्रवार को इस मामले पर सुनवाई हुई, तो लड़की की तरफ से पेश हुए वकील ने कहा कि उसके माता-पिता ने उसे इस स्कूल से हटाकर किसी दूसरे शिक्षण संस्थान में प्रवेश दिलाने का फैसला किया है। छात्रा के माता-पिता की ओर से दी गई दलील को देखते हुए, अदालत ने कहा कि विवादित मुद्दों पर जाने की जरूरत नहीं है। उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार के वकील की इस बात पर भी ध्यान दिया कि बच्चे के माता-पिता के रुख को देखते हुए, विभाग इस मामले में आगे बढ़ना नहीं चाहता है। न्यायमूर्ति वी जी अरुण ने कहा, ‘‘यह अदालत यह देखकर खुश है कि अच्छी समझदारी दिखाई गई है और ‘भाईचारा’, जो हमारे महान संविधान की नींव के मुख्य सिद्धांतों में से एक है, मजबूत बना हुआ है।

 

दूसरी ओर, विशेषज्ञों का कहना है कि यह कोई नई समस्या नहीं है। कई कॉन्वेंट स्कूलों में वर्षों से हिजाब पहनने पर प्रतिबंध रहा है। पर इस बार मामला बढ़ गया क्योंकि बाहरी राजनीतिक और सांप्रदायिक ताकतें इसमें शामिल हो गईं। इसने स्थानीय समुदाय और स्कूल के अन्य अभिभावकों में भय और असुरक्षा की भावना पैदा की। रिपोर्टें हैं कि कुछ अभिभावकों ने अपनी बेटियों को अन्य स्कूलों में स्थानांतरित कर दिया। यह स्पष्ट संकेत है कि शिक्षा संस्थानों में धार्मिक बहुलता और समावेशिता बनाए रखना कितना चुनौतीपूर्ण हो गया है।

 

देखा जाये तो यह घटना केरल में आने वाले विधानसभा चुनावों में राजनीतिक ध्रुवीकरण को तेज कर सकती है। NPP और SDPI जैसे संगठन इस विवाद को अपने लाभ के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं। IUML जैसे मुस्लिम संगठनों के लिए यह उनके समर्थन आधार को सक्रिय करने का अवसर है। दूसरी ओर, CPI(M) और कांग्रेस जैसे प्रमुख दल इस मामले को “सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश” के रूप में प्रस्तुत कर सकते हैं।

 

भविष्य में, ऐसे विवादों का चुनावी रणनीति पर गहरा असर हो सकता है। धार्मिक पहचान और शिक्षा के अधिकार के मुद्दे मतदाताओं के मन में सवाल पैदा कर सकते हैं और मत व्यवहार को प्रभावित कर सकते हैं। राज्य में बहुसंख्यक मतदाता इस प्रकार की घटनाओं पर संवेदनशील हैं, और राजनीतिक दल इसे अपने प्रचार में शामिल करने से नहीं चूकेंगे।

 

सेंट रिटा स्कूल हिजाब विवाद ने यह स्पष्ट कर दिया है कि व्यक्तिगत या पारिवारिक मामलों को अक्सर राजनीतिक और सांप्रदायिक रंग दे दिया जाता है। इसके प्रभाव केवल स्कूल और परिवार तक सीमित नहीं हैं; यह राज्य के राजनीतिक और सामाजिक ताने-बाने में तनाव पैदा कर सकता है। शिक्षा, सुरक्षा और धार्मिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाए रखना चुनौतीपूर्ण हो गया है और इस मामले में यह संतुलन टूटा प्रतीत होता है।

 

बहरहाल, यह मामला एक गंभीर चेतावनी है कि समाज में बहुलता, समावेशिता और संवैधानिक अधिकारों को राजनीति और मीडिया के खेल में न गुमाया जाए। आने वाले चुनावों में यह केवल एक शिक्षा विवाद नहीं रहेगा, बल्कि धार्मिक और राजनीतिक पहचान की लड़ाई का प्रतीक बन सकता है।

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