Maharashtra

शिवसेना विधायक का ‘मराठी मां, उत्तर भारतीय मौसी’ वाला बयान बना आफत, चौतरफा विरोध पर झुके विधायक प्रकाश सुर्वे

शिवसेना (शिंदे गुट) के विधायक प्रकाश सुर्वे ने हिंदी-मराठी भाषा विवाद पर अपनी टिप्पणी से विवाद खड़ा कर दिया है। सुर्वे ने कहा कि मराठी उनकी माँ है, जबकि हिंदी उनकी मौसी है। उन्होंने कहा कि माँ मर जाए तो कोई बात नहीं, लेकिन मौसी नहीं मरनी चाहिए। उत्तर भारतीय समुदाय के सदस्यों द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में बोलते हुए, सुर्वे ने एक मराठी कहावत का अनुवाद करके गैर-मराठी मतदाताओं की प्रशंसा करने की कोशिश की, लेकिन उनके शब्दों के चयन से विवाद पैदा हो गया।

इस टिप्पणी की विपक्षी दलों और मराठी संगठनों ने तीखी आलोचना की, जिसके बाद सुर्वे ने सोमवार को माफी मांगी। उन्होंने एक कार्यक्रम में कहा था, ‘‘मराठी मेरी मां है, लेकिन उत्तर भारत मेरी मौसी है। मां की मृत्यु हो जाए तो एक बार स्वीकार्य है, लेकिन मौसी को नहीं मरना चाहिए। क्योंकि मौसी हमसे ज्यादा प्यार करती हैं। मुझे अपनी मां से ज्यादा प्यार आप लोगों (उत्तर भारतीयों) से मिला है।’’

जब उनका बयान सोशल मीडिया पर सामने आया और शहर के कई हिस्सों में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए, तो सुर्वे ने माफी मांगकर माहौल को शांत करने की कोशिश की। उन्होंने पत्रकारों के सामने हाथ जोड़कर कहा, ‘‘मराठी मेरी मां और मौसी दोनों हैं। ये शब्द अनजाने में निकल गए। अगर मेरे बयान से किसी की भावनाओं को ठेस पहुंची है, तो मैं तहे दिल से माफी मांगता हूं।’’

महाराष्ट्र के उद्योग मंत्री उदय सामंत ने विधायक का बचाव करते हुए कहा, ‘‘यह शब्द गलती से निकल गया और उन्होंने इसके लिए माफी मांग ली है। हालांकि, कुछ लोग उनके बयान का इस्तेमाल राजनीतिक लाभ उठाने के लिए कर रहे हैं। मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में, हमने मराठी की गरिमा को बनाए रखने के लिए निरंतर काम किया है, जिसे शास्त्रीय का दर्जा दिया गया है।’’ सुर्वे की टिप्पणी पर उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना (उबाठा), महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) और मराठी एकीकरण समिति ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की और मंगलवार को दहिसर में विरोध मार्च निकाला।

इस विवाद ने महाराष्ट्र की राजनीति में मराठी बनाम हिंदी की बहस को और हवा दे दी है, जो पहले स्कूलों में हिंदी को अनिवार्य विषय बनाने के सरकार के फैसले से भड़की थी। मुंबई नगर निगम चुनाव नज़दीक आते ही, तनाव बना हुआ है क्योंकि राजनीतिक नेता भाषाई भावनाओं का फायदा उठाने में लगे हैं।

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