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हम आवश्यकता से अधिक आजाद हो गये

15 अगस्त 1947 के दिन अखण्ड भारत को खंड खंड करने वाली हिंदू- मुस्लिम के तराजू में तुल हुई हमें आधी अधूरी स्वतंत्रता प्राप्त हुई

15 अगस्त 1947 के दिन अखण्ड भारत को खंड खंड करने वाली हिंदू- मुस्लिम के तराजू में तुल हुई हमें आधी अधूरी स्वतंत्रता प्राप्त हुई। स्वतंत्र भारतवर्ष हिंदुस्तान और पाकिस्तान के रूप में दो भागों में बंट गया था। इस दिन लाखों बेकसूर लोग हिंदुस्तान और पाकिस्तान के विभाजन में मारे गए थे। 15 अगस्त 1947 के दिन हमें खून से लथ-पथ आधी अधूरी आजादी पर संतोष करना पड़ा। 1947 में बोये गए विषैले शूल आज भी हमारे सीने को भेंद रहे हैं। कहने को तो हम स्वतंत्र हैं लेकिन सत्य तो यह है कि आज भी हम ईष्ट इंडिया कंपनी द्वारा रखी गयी शर्तों का अनुपालन कर रहे है।
हम आजाद है क्योंकि हमें कुछ भी कहने की कुछ भी बोलने की स्वतंत्रता है। हमें फतवे जारी करने और किसी का सर कलम करने की स्वतंत्रता है। हम स्वतंत्र है क्योंकि महाभारत तरह आज भी दु:शासन को द्रोपदी का चीरहरण करने की स्वतंत्रता है। हम आजाद है क्योंकि हमें वंदे मातरम और भारत माता की जय का विरोध करने की स्वतंत्रता है। हम आजाद हैं क्योंकि हमें स्वतंत्रता संग्राम में अपने प्राणों को न्योछावर करने वाले उन क्रांतिकारियों को आतंकवादी व देशद्रोही कहने की स्वतंत्रता है। हम आजाद है क्योंकि हमें जाति के आधार पर सरकारी नौकरियां और पदोन्नति प्राप्त करने की स्वतंत्रता है। हम स्वतंत्र है क्योंकि हमें किसी भी धर्म के विरुद्ध टिप्पणी करने का पूर्ण अधिकार है। हम आजाद हैं क्योंकि हमें दंगा करने किसी की दुकानें लूटने व गाडियों को जला देने व बस्तियों में आग लगाने, उत्पाद करने, दंगा करने की स्वतंत्रता है।
देश की स्वतंत्रता का प्रथम जश्न हमने अपनों का रक्त बहा कर मनाया है। जिसके जख्मों के निशान आज भी हमारे हृदय को कुरेदते है। गरीबो का उत्पीड़न बेटियों का शोषण खाद्य पदार्थों में जहरीले पदार्थों का मिश्रण हमारी आदत बन गयी है। हम इतने स्वतंत्र हो गए हैं कि हमारी महत्वाकांक्षा से स्वतंत्रता की गरिमा को नष्ट कर दिया है। नदियां गन्दी हो रही है। वन क्षेत्र व वन प्राणी संकट में है। धार्मिक स्थलों को सुरक्षा की आवश्यकता है और भारतीय संस्कृति को पश्चिमी सभ्यता का ग्रहण लग चुका है। हमारे बेटे व बेटियाँ अमर्यादित हो चुके है। आज देश समाज और संस्कृति से हमारा कोई रिश्ता नहीं है। हमे आजादी मिली शायद आवशायकओं अधिक हम आजाद हो गये। हमें आजादी चाहिए थी मगर इतनी भी नहीं की स्वतंत्रता संग्राम के उन वीरों जिन्होने हमारे लिए अपने प्राणों की बाजी लगायी उनकी आत्मा को भी अपने बलिदान पर प्रायश्चित करना पड रहा हो।
हम स्वतंत्रता के इस जश्न को मनाते हुए आंखों में आंसू को भरने के अलावा और कुछ भी नहीं कर सकते क्योंकि यह स्वतंत्र भारतवर्ष अनियन्त्रित हो रहा है। हमें भारतवर्ष से नहीं धर्म/मज़हब जाति और स्वयं से प्रेम है। देश से प्रेम करने का दिखावा हमारी आवश्यकता है क्योंकि सत्ता के सुख का मार्ग यही से निकलता है।
लेखक-
समाजसेवी आर०आर०डी० उपाध्याय

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