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सरासर गलत फैसला… ब्रेस्ट पकड़ना रेप नहीं वाली HC की टिप्पणी पर केंद्रीय मंत्री ने उठाए सवाल

“किसी लड़की के स्तनों को पकड़ना, उसके पाजामे का नाड़ा तोड़ना और उसे पुलिया के नीचे खींचने का प्रयास करना… बलात्कार या बलात्कार के प्रयास का आरोप लगाने के लिए पर्याप्त नहीं है।” ये इलाहाबाद के चीफ जस्टिस राम मनोहर नायायण मिश्रा का कहना है। धारा 376 यानी बलात्कार और यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण यानी पास्को अधिनियम की धारा 18 के अंतर्गत दर्ज एक मुकदमे में जमानत देते हुए उन्होंने ये टिप्पणी की और फिर ये सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बना हुआ है। ये मामला कासगंज जिले का है। यहां के रहने वाले पवन और आकाश पर एक नाबालिग लड़की से रेप के प्रयास के आरोप लगे थे। केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री अन्नपूर्णा देवी ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के हाल ही में दिए गए फैसले की कड़ी निंदा की है। फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए अन्नपूर्णा देवी ने इसे गलत बताया और सुप्रीम कोर्ट से इस मामले पर ध्यान देने का आग्रह किया। उन्होंने चेतावनी दी कि इस तरह के फैसले से समाज में गलत संदेश जाएगा।

देवी की भावनाओं को दोहराते हुए, अन्य महिला नेताओं ने भी सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप की मांग की। तृणमूल कांग्रेस की सांसद जून मालिया ने एक निजी मीडिया से बात करते हुए कहा कि देश में जिस तरह से महिलाओं के प्रति पूरी तरह से उपेक्षा की जा रही है, वह काफी घृणित है, जिसे हमें खत्म करने की जरूरत है। दिल्ली महिला आयोग की पूर्व अध्यक्ष और राज्यसभा सांसद स्वाति मालीवाल ने कहा कि बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है। मैं फैसले में की गई टिप्पणियों से बहुत हैरान हूं। यह बहुत शर्मनाक स्थिति है। उन पुरुषों द्वारा किए गए कृत्य को बलात्कार के बराबर का कृत्य कैसे नहीं माना जा सकता? मुझे इस फैसले के पीछे का तर्क समझ में नहीं आता। सुप्रीम कोर्ट को हस्तक्षेप करने की जरूरत है।

क्या है पूरा मामला

आरोपी पवन और आकाश को कासगंज की एक कोर्ट ने आईपीसी की धारा 376 (दुष्कर्म) और पॉक्सो एक्ट की धारा 18 के तहत मुकदमे के लिए तलब किया था। आरोपियों ने निचली अदालत के समन को हाई कोर्ट में चुनोती दी थी। आरोपियों की ओर से ये तर्क दिया गया था कि उन्होंने धारा 376 के तहत कोई अपराध नहीं किया है। ये मामला केवल 354, 354 बी और पॉस्को अधिनियम के अंतर्गत ही आ सकता है। इलाहबाद हाई कोर्ट ने भी इस पर सहमति दिखाई। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक अजीबो- गरीब फैसले में कहा है कि किसी नाबालिग लड़की के निजी अंग पकड़ना, उसके पायजामे की डोरी तोड़ना और उसे घसीटने की कोशिश करना जस्टिस मिश्र दुष्कर्म या दुष्कर्म के प्रयास का मामला नहीं बनता। कोर्ट ने इसे अपराध की ‘तैयारी’ और ‘वास्तविक प्रयास’ के बीच का अंतर बताया और निचली कोर्ट द्वारा तय गंभीर आरोप में संशोधन का आदेश दिया।

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