शिक्षक के संघर्ष ने बदली विद्यालयों की तस्वीर
कलेक्टर से मिले और अपनी परेशानी रख कर उसे दूर करने का आग्रह किया। कलेक्टर ने स्कूल का दौरा किया और यहीं से युक्तियुक्तकरण की नीति ने जन्म लिया, जो आज भी पूरे प्रदेश में लागू है।
इंदौर। शिक्षक बच्चों को शिक्षित कर ही उनका भविष्य नहीं संवारते, कई बार शिक्षा के मंदिर को भी नया रूप दे देते हैं। उनके संघर्ष से स्कूलों की तस्वीर बदल जाती है। पहली से लेकर पांचवीं तक का प्राइमरी स्कूल दो कमरों में तीन शिफ्ट में लगता देख शिक्षक के मन में टीस उठी कि दो पारियों में स्कूल संचालित होना चाहिए। फिर क्या था, कलेक्टर से मिले और अपनी परेशानी रख कर उसे दूर करने का आग्रह किया। कलेक्टर ने स्कूल का दौरा किया और यहीं से युक्तियुक्तकरण की नीति ने जन्म लिया, जो आज भी पूरे प्रदेश में लागू है।
बीमारी भी नहीं तोड़ पाई जज्बाकोरोना महामारी के दौर में शिक्षक भी अछूते नहीं रहे। उन्हें बीमारी ने घेरा, पैरालिसिस भी हुआ और बायपास तक हो चुका है, लेकिन आज भी वे उसी जज्बे के साथ बच्चों के बीच उन्हें शिक्षा देने से पीछे नहीं हटते। वर्तमान में छोटी खजरानी स्कूल में भी बच्चों को नवाचार के साथ पढ़ाई कर आते हैं। स्कूल के बच्चे त्योहारों के समय अपने हाथों से राखी, मिट्टी के गणेशजी जैसी कलाकारी करने से पीछे नहीं हटते हैं।

तबेले में स्कूल देख, संवारने का लिया संकल्प

वे बताते हैं जब देपालपुर से ट्रांसफर हुआ और इंदौर में 1994 में मालवीय नगर के प्राथमिक विद्यालय पहुंचे। विद्यालय की दुर्दशा देख बहुत पीड़ा हुई । शहर का स्कूल और वह भी तबेले के रूप में संचालित हो रहा है। दो कमरों में कक्षा पहली से पांचवीं तक तीन पारियों में बच्चों को पढ़ाया जा रहा था। उन्होंने संकल्प किया कि कितना ही विरोध झेलना पड़े, लेकिन इस स्कूल की तस्वीर बदलना होगी। फिर क्या था, तात्कालिक कलेक्टर मनोज श्रीवास्तव को स्कूल का दौरा करने के लिए मनाया। कलेक्टर ने स्कूल की हालत देखी तो उनसे भी नहीं रहा गया। उन्होंने तत्काल स्कूल के लिए नई बिल्डिंग बनाने की प्लानिंग के निर्देश दिए। इसी दौरान उन्हें पता लगा स्कूल किराए की जमीन पर संचालित हो रहा है। जिस जमीन पर स्कूल संचालित हो रहा है वह नजूल विभाग ने ही एक व्यक्ति को आवंटित की थी। कलेक्टर ने तत्काल नजूल अधिकारी को पट्टा निरस्त कर इसे शासकीय घोषित किए जाने के आदेश दिए। बाद पट्टा निरस्त कर यह जमीन शिक्षा विभाग को दी गई। शिक्षा विभाग में नगर निगम के सहयोग से यहां पांच कमरों की एक बिल्डिंग तैयार कर दी, जो आज भी शान से खड़ी है।
किसी शिक्षक नहीं, कहीं ढेरों
वे बताते हैं इसी दौरान शिक्षकों की कमी का भी मुद्दा सामने आया। तब कलेक्टर श्रीवास्तव ने पूरे जिले में शिक्षकों का सर्वे कराया। सर्वे में चौंकाने वाले खुलासे हुए। कई विद्यालय ऐसे थे, जहां क्षमता से अधिक शिक्षक कार्यरत थे। तब उन्होंने युक्तियुक्तकरण की योजना तैयार की और जहां अधिक शिक्षक थे उन्हें वहां से हटाकर कम संख्या वाले स्कूलों में भेज दिया। इस दौरान कई शिक्षकों को जिलों के बाहर तक भी जाना पड़ा। शिक्षकों ने इस दौरान पंडित का काफी विरोध भी किया, लेकिन वह शिक्षा विभाग में सुधार, शिक्षकों की लड़ाई और बच्चों को पढ़ाई के साथ-साथ नवाचार में कभी पीछे नहीं रहे।
कबाड़ से जुगाड़उन्होंने शुरू से ही बच्चों को रचनात्मक गतिविधियों से जोड़ने का काम किया। कबाड़ से जुगाड़ की तकनीक भी उन्होंने स्कूल में आने वाले गरीब और निर्धन बच्चों को उनकी आवश्यकताओं की सामग्री बनाने में बखूबी मदद की। बच्चों ने भी शिक्षक के साथ कई ऐसी सामग्री बनाई जो उनकी दैनिक उपयोग में काम आती थी। सामग्रियां पढ़ाई में भी बहुत उपयोगी रहती थीं।


