महाराणा प्रताप ने कभी भी मुगल साम्राज्य की अधीनता नहीं की थी स्वीकार
मुगल बादशाह अकबर की अधीनता स्वीकार न करने वाले वीरता, शौर्य, त्याग व पराक्रम के लिए जाना जाने वाले महाराणा प्रताप का जन्म 9 मई 1540 को हुआ था। उन्होंने मुगल बादशाह अकबर से कई सालों तक संघर्ष किया।

गुडग़ांव। मुगल बादशाह अकबर की अधीनता स्वीकार न करने वाले वीरता, शौर्य, त्याग व पराक्रम के लिए जाना जाने वाले महाराणा प्रताप का जन्म 9 मई 1540 को हुआ था। उन्होंने मुगल बादशाह अकबर से कई सालों तक
संघर्ष किया। कई बार उन्होंने मुगलों को युद्ध में भी हराया, लेकिन उन्होंने कभी भी अकबर की अधीनता स्वीकार नहीं की। उन्हें अपना सामाज्य छोडक़र जंगलों की खाक छाननी पड़ी थी। दानवीर भामाशाह ने उनके लिए अपनी
तिजोरी का मुंह खोल दिया था, ताकि मुगल साम्राज्य का डटकर सामना किया जाए। महाराणा प्रताप के डर से अपनी राजधानी लाहौर लेकर चला गया था और महाराणा के स्वर्ग सिधारने के बाद आगरा लेकर आया था। उक्त उद्गार सामाजिक संस्था डा. राजेंद्र प्रसाद फाउण्डेशन के अध्यक्ष राजेश पटेल ने सैक्टर 9 स्थित प्राथमिक विद्यालय में महाराणा प्रताप की जयंती पर आयोजित कार्यक्रम में व्यक्त किए। उन्होनें कहा कि महाराणा प्रताप की टक्कर में कोई और योद्धा इतिहास में नहीं के बराबर है। उन्होंने राजस्थान में राजपूतों की शान को वह ऊंचाई दी थी जिसकी मिसाल विश्व में नहीं मिलती है। समाजसेवी छोटेलाल प्रधान कहा कि उन्होंने कभी मुगल सम्राट अकबर से हार नहीं मानी। मेवाड़ की आन-बान-शान के लिए उन्होंने कभी समझौता नहीं किया, चाहे परिस्थितियां कितनी भी अलग क्यों न रही हों। 19 जनवरी 1597 को महाराणा प्रताप का निधन हो गया था। कार्यक्रम में शामिल लोगों ने महाराणा प्रताप के चित्र पर पुष्प अर्पित कर श्रद्धासुमन अर्पित किए, जिनमें पूजा, किरण, खुशबू, नकुल, मुकेश, नमन, तारा, काजल सहित स्कूल के प्रधानाचार्य व स्टाफ के सदस्य भी शामिल रहे।




