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नौ महिलाओं की भावभंगिमाओं से हाथी का शिल्पन

इन्दौर। हाथी को शिल्प कला में बहुत महत्व दिया गया है। प्राचीन वास्तु शिल्प चाहे वे देवालय हों, आवीसीय अट्टालिकाएँ हों या किले-बुर्ज, उनमें गज का अंकन एक तरह से अनिवार्य ही रहा है। मंदिरों के बाह्य भाग में तो हाथी का विभिन्न मुद्राओं में पंक्तिबद्ध शिल्पन अनेकानेक प्राचीन व अर्वाचीन मंदिरों की सुन्दरता व आर्षक दृश्यों हेतु किया गया है। हाथी सभी जानवरों में सबसे शक्तिशाली माना गया है। यह शौर्य का प्रतीक तो है ही, समृद्धि का प्रतीक भी है। गणेश जी का आनन होने से हाथी पूज्य भी है। हाथी की सवारी बहुत बड़े सम्मान की द्योतक रही है। हाथी मानव का बहूपयोगी भी रहा है। सैन्य उपयोग में तो हाथी सर्वाधिक महत्वपूर्ण रहा ही है, मंदिर आदि के निर्माण में जहाँ भारी सामान शिलाएँ आदि ले जाना होती थीं तब हाथी का ही उपयोग किया जाता था। बड़े-बड़े पेड़-लकलिड़यों का परिवहन या उतारने-चढ़ाने का कार्य भी हाथी के द्वारा ही करवाय जाता था।
तमिलनाडु के तिरुकुरुगुंडी का प्रसिद्ध वैष्णवी विष्णु मंदिर सर्वाधिक नक्कासीदार मंदिरों में से एक है। यह स्थान तिरुनेलवेली से 45 किमी. दूर है। इस मंदिर के वाह्य भाग में अन्य नक्कासीदार शिल्प में सिर्फ एक फुट का हाथी बना है। वह अपने आप में अनूठी कला लिए है। यह हाथी केवल नौ महिलाओं-महिलाओं से बना है। हाथी के सभी अंग-प्रत्यंग नौ महिलाओं की विभिन्न मुद्राओं से शिल्पित हैं। संभवतः यह हाथी कामदेव का रूप है। महिला के विभिन्न मुद्रा, भाव-भंगिमा, यौवनाकर्षण से कोई बच नहीं सकता। इसी के प्रतीक स्वरूप सबसे ऊपर एक महिला काम-बाण लेकर आरूढ है। ऐसा ही एक हाथी कर्नाटक के जैन मठ मूडबद्री के मुख्य मंदिर के प्रवेश-द्वार के द्वार पर बना है। यहाँ यह नक्कासी काष्ठ का द्वार पर काष्ठ में ही की गई है।
शास्त्रों में कन्याओं के अलग अलग स्वरूप वर्णित हैं। उनमें कन्या का एक प्रकार ‘गजगामिनी कन्या’ भी दिया गया है।
तमिल नाडु के उक्त विष्णुमंदिर की दीवार पर एक 10वीं शताब्दी का शिलालेख है। किन्तु वर्तमान में उपलब्ध वास्तुकला और मूर्तिकला के विषय में कहा जाता है कि यह कार्य विजयनगर नायक शासकों द्वारा करवाया गया है। इनका शासनकाल 15वीं- 16वीं शताब्दी माना जाता है।

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