धर्म

नाथ सम्प्रदाय के आराध्य श्री गुरू गोरक्षनाथ महापर्व

नाथ सम्प्रदाय के ईष्ट देव महायोगी श्री गुरू गोरक्षनाथ जी एक असाधारण साधक थे। वह योग की उस अवस्था तक पहुँचे जहाँ असाध्य रोगों को भी योग के द्वारा ठीक किया जा सकता है।

लेखक:- आर०आर०डी० उपाध्याय। नाथ सम्प्रदाय के ईष्ट देव महायोगी श्री गुरू गोरक्षनाथ जी एक असाधारण साधक थे। वह योग की उस अवस्था तक पहुँचे जहाँ असाध्य रोगों को भी योग के द्वारा ठीक किया जा सकता है। गुरू गोरक्षनाथ की योग साधना में कायाकल्प की भी चर्चा होती है। शरीर से आत्मा को अलग कर पुनः शरीर में स्थापित करना या एक शरीर से दुसरे निर्जीव शरीर में आत्मा को स्थापित करना कायाकल्प कहलाता है। गुरू गोरक्षनाथ की इस अद्भुत, आलोकित, वैज्ञानिक और अकल्पनीयक योग विद्या जिसे समझ पाना आसान नहीं था जिसे गोरक्षधंधा कहा गया। गुरू गोरक्षनाथ द्वारा आविष्कार किया गया गोरक्ष धंधा एक यंत्र भी है। कुछ सनातन विरोधियों, मुर्ख और भाषा की समझ न रखने वाले लोगों ने गोरक्षधंधा शब्द का प्रयोग काला बाज़ारी, तस्करी, मिलावटखोरी के लिए करना प्रारम्भ कर दिया और आज भी अल्पज्ञानी इन बुरे कार्यों के लिए गोरक्ष धंधा शब्द का प्रयोग करते है।
गुरू गोरक्षनाथ नाथ के जीवन चरित्र में छेड़छाड़ करते हुए, कुछ स्वार्थी लोगों ने उन्हें काल्पनिक कहानियों जैसा बना दिया। गुरू गोरक्षनाथ का जन्म गोबर से नहीं बल्कि उनका जन्म पूर्णतः वैज्ञानिक है। कोशिकाओं से उत्पन्न जीव व क्लोन् के विषय में तो अवश्य सुना होगा। स्त्री के बिना मशीन द्वारा उत्पन्न होने वाले बेबी पॉड पर वैज्ञानिकों को गौरवान्वित होते हुए आपने देखा ही होगा तो फिर गुरू गोरक्षनाथ का जन्म बिना स्त्री के क्यों नहीं हो सकता। हमारे शरीर की रचना पाँच भौतिक पदार्थों से हुई है। एक पदार्थ से जीव का निर्माण हो सकता है। गुरू मच्छंदर नाथ ने कायाकल्प करके ही संगलदीप में प्रवेश किया था तो आप समझ सकते है कि वह विज्ञान कितनी उचाईयों पर होगा और गुरू मछंदरनाथ कितने बड़े वैज्ञानिक (साधक) होंगे।

प्रमाणों के आधार पर गुरू गोरक्षनाथ की उत्पत्ति (जन्म) बैशाख की पूर्णिमा हैं। हालाँकि गुरू गोरक्षनाथ के जन्म के विषय में तीन तिथियाँ प्रचलित है। (1) बैशाख की पूर्णिमा, (2) कार्तिक शुक्ल पक्ष की त्रिर्योदशी और (3) बसंत पंचमी। देश के विभिन्न राज्यों में गुरू गोरक्षनाथ के अवतरण को मनाने के लिए ये तिथियाँ निर्धारित है। गृहस्थ गोरक्ष पंथी विभिन्न प्रदेशों में अपने-अपने अनुसार इन्हीं तिथियों में गुरू गोरक्षनाथ महापर्व (जयंती) मनाते है। हालाँकि सन्त समाज में गुरू गोरक्षनाथ की जयंती का उत्साह मनाने का कोई प्रावधान या प्रचलन नहीं है।
प्रमाणित आधार पर अवध की माटी में, गुरू गोरक्षनाथ का अवतरण (जन्म) बैशाख की पूर्णिमा को मंगलवार के दिन अमेठी जिले के जायस कस्बे में हुआ था। बैशाख की पूर्णिमा को गुरू गोरक्षनाथ के जन्म के प्रमाण अनेको पुस्तकों और ग्रन्थों में मिलते है। गुरू गोरखनाथ के जन्म का उल्लेख गुरू गोरक्षनाथ मन्दिर गोरखपुर से प्रकाशित महागुरू गौरक्षनाथ एवं उनकी तपस्थली नामक पुस्तक में भी प्रमुखता से किया गया है।
योगी नरहरिनाथ जी के अनुसार भी गुरू गोरक्षनाथ का अवतरण बैशाख की पूर्णिमा, दिन मंगलवार को हुआ था। गोरक्षनाथावतार कथा ग्रंथ में प्रमाणित गोरक्षनाथ के जन्म को इस प्रकार दर्शाया गया है-
बैशाखी शिव पूर्णिमा तिथिवरे वारे मंगले।
लोकानुग्रह विग्रहः शिवगुरूर्गोरक्षनाथो भवत।।
उत्तर प्रदेश के जनपद गोरखपुर में एक गुफा है; जहाँ गुरू गोरक्षनाथ के पग चिन्ह और एक मूर्ति स्थापित है। बैशाख की पूर्णिमा को गुरू गोरक्षनाथ के जयंती पर प्रतिवर्ष एक उत्सव मनाया जाता है। जिसे “रोट महोत्सव” कहा जाता है। यहाँ इसी दिन एक भव्य मेले का भी आयोजन होता है। लोगों का मानना है कि गुरू गोरक्षनाथ को सबसे पहले यहाँ देखा गया था। विभिन्न प्रमाणों के आधार पर गुरू गोरक्षनाथ का जन्म बैशाख की पूर्णिमा को प्रमाणित माना गया है। अन्य दो तिथियाँ कार्तिक शुक्ल पक्ष की त्रिर्योदशी और बसंत पंचमी गुरू गोरक्षनाथ के जन्म के लिए प्रमाणित नहीं है।
कुछ लोगों का मानना है कि गुरू गोरक्षनाथ कबीर के समकालीन थे। जो पूर्णतः असत्य है और काल्पनिक है। गुरू गोरक्षनाथ के अवतरण का प्रमाण चक्रवर्ती सम्राट राजा वीर विक्रमादित्य द्वारा बनाया गया पञ्चाङ्ग विक्रम संवत से भी पूर्व है। राजा वीर विक्रमादित्य और उनके बड़े भाई राजा भर्तृहरि के समय भी गुरू गोरक्षनाथ मौजूद थे। राजा भर्तृहरि एक नाथपंथी शासक थे। चक्रवर्ती सम्राट राजा वीर विक्रमादित्य भी गुरू गोरक्षनाथ के ही अनुयायी थे।
508 ईशा पूर्व जन्में जगत-गुरु शंकराचार्य ने नाथ समाज से ही दस नामी गोस्वामी समाज की स्थापना की थी। दसनामी गोस्वामी समाज के सभी गौत्र नाथ और नाथी शब्द से प्रमाणित है। नाथ सम्प्रदाय में केवल गोरक्ष पंथी ही मठाधीश हुए है। इन मठों को गोरक्ष पंथ के गृहस्थ व सन्यासीयों ने संचालित किया। जगत गुरू शंकराचार्य ने इन्हीं नाथ पंथीयों से दसनामी गोस्वामी समाज की रचना की। अर्थात जगत-गुरु शंकराचार्य द्वारा स्थापित दसनामी गोस्वामी समाज, नाथ सम्प्रदाय के गोरक्ष पंथी का परिवर्तित स्वरूप है।
इससे प्रमाणित होता है कि जगत-गुरु शंकराचार्य के जन्म से बहुत पहले गुरू गोरक्षनाथ का अवतरण हुआ है। विभिन्न पुस्तकों और नाथ पंथ के ग्रन्थो के अनुसार गुरू गोरक्षनाथ का अवतरण हजारों वर्ष पूर्व बैशाख की पूर्णिमा दिन मंगलवार को ही हुआ है। कार्तिक शुक्ल पक्ष की त्रिर्योदशी और बसंत पंचमी गुरू गोरक्षनाथ के अवतरण (जन्म) के लिए प्रमाणित नहीं है।

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