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जैन कुबेर की एक मात्र अद्भुत प्राचीन प्रतिमा

वैदिक संस्कृति में कुबेर का अत्यधिक महत्व है। उसी तरह जैन संस्कृति में भी कुबेर को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है।

इन्दौर। वैदिक संस्कृति में कुबेर का अत्यधिक महत्व है। उसी तरह जैन संस्कृति में भी कुबेर को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। जैन पुराणों के अनुसार तीर्थंकर का जब जन्म होता है उसके छह माह पूर्व से ही कुबेर रत्नों की वर्षा करता है, जिससे उनके निश्चित क्षेत्र की जनता निर्धन और दुखी नहीं रहती। रत्नों की वर्षा वह केवल एक दिन नहीं करता बल्कि तीर्थंकर के जन्म के छह माह बाद तक अर्थात् बारह माह प्रतिदिन वर्षा करता है। एक दिन के रत्नों की संख्या भी निश्चित है। फिर तीर्थंकर के अन्य कल्याणकों में, उनके विशिष्ट आहार-ग्रहण करने के समय, दिव्यध्वनि खिरने के समय वह रत्नों की वर्षा करता है। तीर्थंकर की दिव्यध्वनि की विशेष स्टेज समवसरण जिसकी विभूति सुनेंगे तो दंग रह जायेंगे- वह भी इन्द्र की आज्ञा पाकर कुबेर निर्मित करता है। दश दिक्पालों में उत्तर दिशा का दिक्पाल कुबेर है। जिनमूर्ति की प्राणप्रतिष्ठा के समय पंचकल्याणकों के मंचन में कुबेर का अहम स्थान होता है। उस समय किसी श्रावक को ही अभिमंत्रित कर कुबेर बनाया जाता है।
राजस्थान के चित्तौडगढ़ जिलान्तर्गत बंसी (बांसी) से एक प्राचीन अद्भुत जैन कुबेर की प्रतिमा प्राप्त हुई है। जो उदयपुर के राजकीय संग्रहालय सिटी पैलेस में संग्रहीत है। इसका समय 8 वीं सदी ईस्वी है। लाल परेवा प्रस्तर में निर्मित यह कुबेर प्रतिमा अद्भुत कालापूर्ण है। शिल्पकार ने मानों इसके किरीट में ही अपनी सारी कला उड़ेल दी है।
इसमें कुबेर ललितासन में बैठा शिल्पित है। दो हाथ और दो पाद युक्त है। दक्षिण भुजा में नारिकेल घारण किये है और बाम कर में पुस्तक जैसी कोई वस्तु धारण किये दर्शाया गया है। इसका वाहन गज है। पैरों में पादवलय, भुजाओं में भुजबंध, कलाइयों में बटकवलय धारण किये है। गले में हीक्का सूत्र और उपग्रीवा धारण करायी गई है। सुन्दर स्कन्धमाल भी शिल्पित है। कानों में कर्णोत्पल हैं। शिर पर किरीट धारण कराया गया है। यह अत्यंत कलात्मक है। जगह जगह रत्न जड़ित हैं। है भी कुबेर, उसे रत्नों की क्या कमी रहेगी। किन्तु देवों में भी ये व्यवस्था है कि भले ही बह कुबेर हो किन्तु इन्द्र की बरावरी के आभूषण धारण नहीं कर सकता है। मानवों की वर्ण व्यवस्था की तरह वहाँ की जो-इन्द्र, सामानिक, त्रायस्त्रिंस, पारिषद्, आत्मरक्ष, लोकपाल, अनीक, प्रकीर्णक, आभियोग्य और किल्विषक दस स्तरीय व्यवस्था है। उसी के अनुसार उनके कार्य और वेषभूषा होती है। उस व्यवस्था का कोई देव उल्लंघन नहीं कर सकता।
इस कुबेर प्रतिमा के किरीट में कौस्तुभ मणि शिल्पित है। उसके ऊपर मध्य में उसके आराध्य तीर्थंकर की प्रतिमा है और सिर के ऊपर भी एक अतिरिक्त तीर्थंकर प्रतिमा है। अन्य जैन सरस्वती और यक्ष-यक्षी के सिर या मुकुट में एक ही तीर्थंकर प्रतिमा को शिल्पित किये जाने की परम्परा है। किन्तु यह विशिष्ट अंकन है। ऊपर दोनों ओर अशोक वृक्ष के जैसे सुन्दर पत्र-गुच्छक शिल्पित हैं। इस तरह यह प्रतिमा अपने आप में अनूठी है और आठवीं शती से प्राचीन जैन कुबेर की प्रतिमाएँ अन्यत्र दृष्ट नहीं है। या यूं कहें कि इस तरह की कुबेर की एकल प्रतिमा अन्यत्र कहीं नहीं है। यह एक मात्र प्रतिमा है। प्रतिमा शास्त्री डॉ. मरुतिनंदन प्रसाद तिवारी, वाराणसी की अनेक पुस्तकों में से सन् 1981 में ‘जैन प्रतिमा विज्ञान’ प्रकाशित हुई है। उसमें आपने लिखा है कि ‘कुबेर यक्ष की कोई स्वतंत्र या जिनसंयुक्त मूर्ति नहीं मिली है।’

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