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योगी के गढ़ में हिंदुत्व की लहर, जातीय समीकरणों के सहारे गठबंधन

2024 के लोकसभा चुनाव के आखिरी चरण की सबसे हॉट सीटों में शुमार है उत्तर प्रदेश का गोरखपुर। स्वतंत्रता संग्राम हो या फिर साहित्य की बात या फिर धर्म और राजनीति का मामला, गोरखपुर को नजरअंदाज करना मुमकिन नहीं।

2024 के लोकसभा चुनाव के आखिरी चरण की सबसे हॉट सीटों में शुमार है उत्तर प्रदेश का गोरखपुर। स्वतंत्रता संग्राम हो या फिर साहित्य की बात या फिर धर्म और राजनीति का मामला, गोरखपुर को नजरअंदाज करना मुमकिन नहीं। यहीं नाथ पीठ का गोरखनाथ मंदिर है, जो वर्तमान में पूर्वांचल ही नहीं पूरे प्रदेश की राजनीति की धुरी साबित हो रहा है। यहीं पर गीताप्रेस गोरखपुर भी है, जिसने घर-घर गीता, वेद-पुराण को पहुंचाने में भूमिका निभाई है। रामप्रसाद बिस्मिल जैसे आजादी के दीवाने रहे हों या फिर प्रसिद्ध कथाकार प्रेमचंद हों या शायर फिराक गोरखपुरी, उनका भी नाता गोरखपुर से रहा है। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान चौरीचौरा कांड भी यहीं हुआ था।

2017 में योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद से गोरखनाथ शहर की पहचान सीएम सिटी और पॉवर सेंटर के रूप मे होने लगी है। यहां तक कि लखनऊ के बाद इसे उत्तर प्रदेश की दूसरी राजधानी भी कहा जाने लगा है। नेपाल का गेट-वे कहे जाने वाले इस शहर में स्थित नाथ पंथ की पीठ राजनीति और अध्यात्म दोनों का केंद्रबिंदु है। क्योंकि इसी पीठ के महंत रहते हुए योगी आदित्यनाथ 5 बार के सांसद और पिछले 7 वर्षों से मुख्यमंत्री हैं। गोरखपुर में सियासी नब्ज टटोलने पर यही दिखा कि यहां भाजपा से भले ही दूसरी बार सांसद बनने के लिए रविकिशन मैदान में हैं, लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से चुनाव मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ही लड़ रहे हैं। यहां लोग मोदी-योगी के नाम पर ही वोट देने की बातें करते हैं। दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी ने निषाद बहुल इस सीट से एक बार फिर निषाद चेहरे पर ही दांव खेला है। भोजपुरी फिल्मों में कार्य करने वाली काजल निषाद को गठबंधन ने उतारकर जातीय समीकरणों को साधने की कोशिश की है। गठबंधन का भरोसा जातीय समीकरण पर है, लेकिन योगी के गढ़ में हिंदुत्व की लहर पर सवार होने से रवि किशन की राह आसान दिख रही है। बसपा ने जावेद सिनमानी को उतारकर मुकाबले को त्रिकोणीय बनाने की कोशिश की है। लेकिन यहां भाजपा को सपा ही टक्कर देने की स्थिति में है।
रेल स्टेशन के पास मिले प्रवीण कुमार कहते हैं कि जिस शहर से मुख्यमंत्री हों, जहां केंद्र और राज्य से विकास के तमाम प्रोजेक्ट चल रहे हों, वहां भला भाजपा को कौन हरा सकता है? यह पूछे जाने पर कि 2018 के उपचुनाव में तो भाजपा हार गई थी, इस सवाल पर पास में मौजूद रघुबीर प्रसाद कहते हैं कि उस समय पार्टी ने कमजोर प्रत्याशी उतारा था और योगीजी का आशीर्वाद भी हासिल नहीं था, इसलिए पार्टी हार गई थी। लेकिन, वही 2019 में रविकिशन को योगीजी का आशीर्वाद मिला तो बंपर वोटों से जीते। फूलमती यादव महंगाई और बेरोजगारी की समस्या गिनाती हैं। कहती हैं कि बेटा बीएड और टीईटी करके बेरोजगार बैठा है, पिछले पांच साल से सरकार ने शिक्षक भर्ती की वैकेंसी नहीं निकाली है। इसलिए वो बदलाव के लिए वोट करेंगी।

25 वर्षीय राहुल कहते हैं कि बाबा के सीएम बनने के बाद से गोरखपुर का नक्शा ही बदल गया है। रामगढ़ ताल तो गोरखपुर का गोवा साबित हो रहा है। ताल में क्रूज चलते हैं और फ्लोटिंग रेस्टोरेंट भी। यहां गोरखपुर के बाहर से लोग भी घूमने आते हैं।

1989 से इस सीट पर भगवा लहर चल रही है। 1984 तक हुए पिछले 8 चुनावों में 6 बार यहां कांग्रेस का पंजा चला। बीच में एक बार 1967 में गोरक्षपीठ के तत्कालीन महंत दिग्विजयनाथ ने यह सीट जीती थी तो 1977 में आपातकाल को लेकर कांग्रेस के खिलाफ जनता में गुस्से के कारण जनता पार्टी प्रत्याशी हरिकेश बहादुर जीतने में सफल रहे थे। 1984 से इस सीट पर जीत के लिए कांग्रेस तरसती रही है। 1989 से लेकर 1996 तक गोरक्षपीठाधीश्वर महंत अवेद्यनाथ यहां से सांसद रहे। 1989 का चुनाव महंत अवेद्यनाथ ने हिंदू महासभा के बैनर तले लड़ा था। 1998 से लेकर 2014 तक लगातार पांच बार योगी आदित्यनाथ इस सीट से चुनाव जीते।

गोखपुर में करीब साढ़े तीन लाख निषाद मतदाता निर्णायक हैं। यहां समाजवादी पार्टी ने भोजपुरी अभिनेत्री और निषाद जाति की काजल को चुनाव लड़ाया है। सपा का यादव और मुस्लिम वोटबैंक और निषाद वर्ग में सेंधमारी पर गठबंधन का प्रदर्शन निर्भर है। हालांकि, भाजपा के लिए राहत की बात है कि पूर्वोंचल के निषाद मतदाताओं पर पकड़ रहने वाले संजय निषाद की निर्बल इंडियन शोषित हमारा आम दल(निषाद पार्टी) एनडीए के साथ है। 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने संसदीय क्षेत्र की पांचों विधानसभा क्षेत्रों पर कब्जा जमाया था। गोरखपुर सदर सीट से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पहली बार विधायक बने थे।

2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा प्रत्याशी रवि किशन ने सपा प्रत्याशी राम भुआल निषाद को तीन लाख से अधिक वोटों से हराया था। रविकिशन को कुल पड़े मतों का 60.54 प्रतिशत यानी 717,122 वोट मिले थे, जबकि रामभुआल निषाद को 4,15,458 वोट मिले थे, वहीं कांग्रेस प्रत्याशी मधुसूदन त्रिपाठी 22,972 वोट पाकर तीसरे स्थन पर थे। जबकि 2018 के उपचुनाव में प्रवीण कुमार निषाद 456,589 वोट पाकर जीते थे, उन्होने भाजपा के उपेंद्र शुक्ल को हराया था। उपेंद्र शुक्ल को 4,34,783 वोट मिले थे। 2014 के चुनाव में योगी आदित्यनाथ को 5,39,127 वोट मिले थे और उन्होंने सपा के रामजीत निषाद को 3 लाख से अधिक वोटों से हराया था।

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