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डब्ल्यूएफआई प्रमुख को हिरासत में लेने से कोई उद्देश्य पूरा नहीं होगा, अदालत ने सशर्त जमानत दी : दिल्ली कोर्ट

नई दिल्ली। महिला पहलवानों के यौन उत्पीड़न मामले में भाजपा सांसद और भारतीय कुश्ती महासंघ (डब्ल्यूएफआई) के पूर्व प्रमुख बृजभूषण शरण सिंह को नियमित जमानत देने के दिल्ली की एक अदालत के हालिया आदेश ने कई सवालों के जवाब छोड़ दिए हैं।

मुख्य सवाल यह उठता है कि सिंह पर गंभीर आरोप लगने के बाद भी उन्हें जमानत क्यों दी गई? राउज एवेन्यू कोर्ट के अतिरिक्त मुख्य मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट हरजीत सिंह जसपाल ने शुक्रवार को जारी अपने नौ पेज के आदेश में कहा कि सिंह के खिलाफ यौन उत्पीड़न के आरोप गंभीर हैं लेकिन इस स्तर पर उन्हें हिरासत में लेने से कोई उद्देश्य पूरा नहीं होगा।

कानून के मुताबिक, जब आरोपी की गिरफ्तारी नहीं हुई है और मामले में बिना गिरफ्तारी के ही चार्जशीट दायर हो चुकी हो तो उन्हें जमानत मिलनी चाहिए। सिंह के खिलाफ आईपीसी की धारा 354, 354ए और 354डी के तहत अपराध के लिए दिल्ली पुलिस की 1,599 पन्नों की चार्जशीट, जिसमें लगभग 200 गवाहों के बयान शामिल हैं, 15 जुलाई को मुख्य मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट महिमा राय के समक्ष दायर की गई थी।

अदालत ने सह-अभियुक्त, सिंह के पूर्व सहायक सचिव विनोद तोमर की जमानत याचिका भी मंजूर कर ली। तोमर पर आईपीसी की धारा 109, 354, 354 ए, 506 के तहत अपराध का आरोप लगाया गया है।

न्यायाधीश ने आदेश में कहा, ”वर्तमान मामले में, आरोप गंभीर हैं। मेरे विचार में, आरोपों की गंभीरता निस्संदेह जमानत आवेदनों पर विचार करते समय प्रासंगिक विचारों में से एक है, लेकिन इसे तय करने के लिए यह एकमात्र टेस्ट या फेक्टर नहीं है।”

आदेश में आगे कहा गया है कि जब विचाराधीन कैदियों को अनिश्चित काल के लिए जेल में बंद रखा जाता है, तो संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन होता है। न्यायाधीश ने कहा कि मौजूदा मामले में मेरी राय में इस स्तर पर आरोपी व्यक्तियों को हिरासत में लेने से कोई उद्देश्य पूरा नहीं होगा।

आरोपियों की ओर से पेश हुए वकील राजीव मोहन ने दलील दी थी कि आरोपी व्यक्तियों को इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए जमानत दी जानी चाहिए कि चार्जशीट बिना गिरफ्तारी के दायर की गई है और वे समन मिलने पर खुद अदालत के सामने पेश हुए हैं।

राजीव मोहन ने तर्क दिया था कि आरोपी नंबर 1 संसद सदस्य हैं और उनकी हिरासत जनता के चुने हुए प्रतिनिधि के रूप में उनके कार्यों के निर्वहन में बाधा बनेगी। अदालत ने सात जुलाई को मामले में सिंह और तोमर को तलब किया था। एसीएमएम जसपाल ने कहा कि पुलिस रिपोर्ट में आरोप भारत के अंदर और बाहर विभिन्न स्थानों पर लगभग दस वर्षों की अवधि में फैले यौन उत्पीड़न की विभिन्न घटनाओं से संबंधित हैं।

वहीं दूसरी ओर, शिकायतकर्ताओं की ओर से पेश वकील हर्ष बोरा ने इस आधार पर जमानत पर आपत्ति जताई कि आरोपी प्रभावशाली लोग हैं। गवाहों को प्रलोभन देने और पीड़ितों को धमकी देने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है।

हालांकि, न्यायाधीश ने अतिरिक्त लोक अभियोजक अतुल श्रीवास्तव की दलीलों पर ध्यान देते हुए कहा कि आरोपियों से कानून के अनुसार निपटा जाना चाहिए। अदालत ने कहा कि जमानत का उद्देश्य न तो दंडात्मक है और न ही निवारक। स्वतंत्रता से वंचित करना एक सज़ा माना जाना चाहिए।

न्यायाधीश ने कहा कि देश का कानून सभी के लिए समान है, इसे न तो पीड़ितों के पक्ष में खींचा जा सकता है और न ही इसे आरोपी के पक्ष में झुकाया जा सकता है। आरोपी किसी भी सबूत के साथ छेड़छाड़ नहीं करेगा, या किसी भी पीड़ित या किसी अन्य गवाह को किसी भी तरह से कोई धमकी, प्रलोभन या वादा नहीं करेगा।

जज ने आदेश दिया कि जब भी बुलाया जाएगा आरोपी व्यक्ति अदालत में पेश होंगे। आरोपी व्यक्ति कोई भी ऐसा अपराध नहीं करेंगे, जिससे उनपर शक हो। आरोपी व्यक्ति अदालत की पूर्व अनुमति के बिना देश नहीं छोड़ेंगे। आरोपी व्यक्तियों को 25,000 रुपये के बांड और इतनी ही राशि की एक जमानत राशि देने पर जमानत दे दी गई।

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