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छुट्टी छुट्टी रोज-रोज छुट्टी यह क्या हो रहा है इस पर एक कविता लिखी गई

मवाना( मेरठ)।(जमील अहमद कुरैशी एडवोकेट)

एक इंटरव्यू के दौरान छुट्टी– छुट्टी पर एक कविता पढ़ी जो इस तरह है
इधर से लोटकर दुनिया उधर जाये तो क्या होगा ।
यूं पटरी से अगर गाड़ी उतर जाये तो क्या होगा ।
अदालत की कहीं छुट्टी है कहीं दफ़्तर की छुट्टी है।
कहीं बाबू की छुट्टी है कहीं अफ़सर की छुट्टी है ।
नशा छुट्टी का हर दिल में उतर जाये तो क्या होगा ।
बुलंदी का हरेक सपना बिखर जाये तो क्या होगा ।
कभी सर्दी की छुट्टी है कभी बरसात की छुट्टी ।
कभी त्योहार पर छुट्टी ज़रा सी बात पे छुट्टी ।
ये पूरा साल छुट्टी में गुज़र जाये तो क्या होगा ।
पढ़ाई की व्यवस्था ही बिगड़ जाए तो क्या होगा ।
छपे अख़बार में फोटो यूं कुछ अफसर पे जाते हैं ।
कभी सर्दी कभी गर्मी में वो छुट्टी भी कराते हैं ।
मगर स्कूल बंद हों शाद तो दुख़्तर का कया होगा ।
पढ़ेगा जब नहीं बेटा तो अपने घर का क्या होगा ।
किसी के मरने पे बच्चे बड़ी खुशियां मनाते हैं ।
जो हो ऐलान छुट्टी का तो वो ताली बजाते हैं ।
हमारी आस्था यूं ही उखड़ जाये तो क्या होगा ।
अगर घड़ियां अचानक से ठहर जाये तो क्या होगा ।
कभी हड़ताल पे छुट्टी कभी पड़ताल पे छुट्टी ।
जनम दिन पर कभी छुट्टी मरण के साल पर छुट्टी ।
अगर छुट्टी पे छुट्टी ही पसर जाये तो क्या होगा ।
तरक्की का घरोंदा ही उजड़ जाये तो क्या होगा ।
ये कैसा सिलसिला है दोस्तो छुट्टी पे छुट्टी है ।
जहां सोना नहीं चांदी वहां मिट्टी ही मिट्टी है ।
ये जीवन जो कि हमने प्यार से तोहफे में पाया है ।
ये मिट्टी ही अगर बनकर बिखर जाये तो क्या होगा ।

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