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क्रांतिकारी जोधा सिंह व उनके 51 साथियों को अंग्रेजों ने 28 अप्रैल 1858 को दे दी थी फांसी

गुडग़ांव, 28 अप्रैल (अशोक): भारत के स्वतंत्रता संग्राम में असंख्य लोगों
ने कुर्बानियां दी थी। 1857 की महान क्रांति में भी देशवासियों ने जहां
बढ़-चढक़र भाग लिया था, वहीं तत्कालीन अंग्रेजी हुकूमत का कोपभाजन भी
उन्हें होना पड़ा था और असंख्य लोगों को अंगे्रजों ने सामूहिक रुप से
फांसी पर भी लटका दिया था। इसी क्रम में क्रांतिकारी जोधा सिंह अटय्या की
भी बड़ी भूमिका रही है। जोधा सिंह व उनके 51 साथियों को अंग्रेजों ने 28
अप्रैल 1858 को इमली के पेड पर फांसी दे दी थी। महान क्रांतिकारी मंगल
पाण्डेय ने 10 मई 1857 को क्रांति का शंखनाद किया था तो उसकी गूंज पूरे
भारत में सुनाई दी थी। 10 जून 1857 को उत्तरप्रदेश के फतेहपुर में जोधा
सिंह अटय्या के नेतृत्व में क्रांतिकारियों ने अंग्रेजी हुकूमत का विरोध
करना शुरु किया था। जोधा सिंह का तात्या टोपे से भी संबंध था। मातृ भूमि
को अंग्रेजों से मुक्त कराने के लिए इन दोनों ने मिलकर अंग्रेजों से
पाण्डु नदी के तट पर टक्कर ली थी, जिसमें अंग्रेजी सेना मैदान छोडक़र भाग
गई थी। इन वीरों ने कानपुर में अपना झण्डा गाड़ दिया था। वक्ताओं ने कहा
कि 1857 की 27 अक्टूबर को महमूदपुर गांव में उन्होंने एक अंग्रेज दरोगा
और सिपाही को जलाकर मार दिया था। जोधा सिह ने अवध एवं बुंदेलखड़ के
क्रांतिकारियों को संगठित कर फतेहपुर पर भी कब्जा कर लिया था। देशद्रोही
मुखबिर की सूचना पर अंग्रेजों ने उन्हें परेशान करने में कोई कमी नहीं
छोड़ी। इसी दौरान इन क्रांतिकारियों ने अंग्रेजी ऑफिसर कर्नल पॉवेल की
युद्ध में हत्या भी कर दी थी। अंगे्रजों ने अपने अधिकारी का बदला लेने के
लिए अंगे्रजों की घुडसवार सेना ने किसी मुखबिर की सूचना पर उन्हें घेर
लिया और संघर्ष के बाद जोधा सिंह को उनके 51 क्रांतिकारियों के साथ बंदी
बना लिया गया था। 28 अप्रैल 1858 को उन्हें उनके 51 साथियों के साथ
अंग्रेजों ने फांसी पर लटका दिया था। वक्ताओं ने कहा कि क्रांतिकारियों
को देश सदैव याद रखेगा। उनकी बदौलत ही आज हम सभी खुली हवा में सांस ले
रहे हैं।

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