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क्या था ताजमहल-हिन्दू राजमहल या शिव मंदिर?

ताज महल के विषय में समय समय पर प्रश्नचिह्न खड़े किये गये। वर्तमान में पुनः इस पर आवाज उठ रही है।

नई दिल्ली। मुगलों ने हिन्दुस्तान में शिवालय आदि ध्वस्त किये और उनके ही मलवे से अपनी मस्जिद मकबरे बनवा दिये। यही कारण है कि स्थान स्थान की ये ध्वंस के ऊपर बनाई गई निर्मितियाँ अपनी कहानी चीख-चीख कर कह रहीं हैं कि उनकी वास्तविकता क्या है। ताज महल के विषय में समय समय पर प्रश्नचिह्न खड़े किये गये। वर्तमान में पुनः इस पर आवाज उठ रही है।
हमारे पास पुरुषोत्तम नागेश ओक द्वारा लिखित पुस्तक ‘‘ताजमहल हिन्दू राज-भवन था’’ का चित्र और उसके कुछ पृष्ठों के चित्रों व प्रकाशित तथ्यों के विवरण सुरक्षित हैं। जिनके प्रायः प्रत्येक पृष्ठ पर लिखा है- ‘‘प्रस्तुति निगमेन्द्र सिसोदिया’’। इसमें चित्र के साथ निम्नांकित विवरण है-
1. ताजमहल के शिखर पर त्रिशूल और कलश के चित्र। ताजमहल के शिखर पर कलश और त्रिशूल शिवजी का प्रतीक, यह सनातन धर्म का प्रतीक है। कोई भी इसे इस्लाम का प्रतीक सिद्ध नहीं कर सकता। 2. वैदिक ज्यामिति विधि से निर्मित छत। चित्र व टिप्पणी। 3. ताजमहल के निचने तल पर स्थित संगमरमरी कमरों का समूह.. ये राजा के महल के होने का प्रमाण है। इतने विशाल कमरे क्या मुर्दों के लिए कोई बनाता है? जब मकबरे में किसी को रहना नहीं था तो कोई कमरे क्यों बनाएगा? 4. आन्तरिक पानी का कुआँ। कुआँ बनाने का मतलब महल में रहने वालों के लिए जल प्रबंध। 5. दीवारों पर बने हुए फूल, जिनमें छुपा हुआ है ‘ओम्’। 6. दुनिया में किसी भी मुस्लिम इमारत को महल नहीं कहा जाता। 7. चित्र दरवाजे इंटों से बंद। टिप्पणी- पुरुषोत्तम नागेश ओक की खोज से डरकर इंदिरा गंधी द्वारा बहुत से साक्ष्यों को छुपाने के लिए, ईटों से बंद किया गया दरवाजा। कोई पूछे मकबरे में ये गुप्त कमरे बनाने का मकसद क्या होता है। 8. प्रवेश द्वार पर बने लाल कमल…। कोई मुस्लिम सनातन धर्म प्रतीक कमल फूल को नहीं बनाता। 9. ताज महल में वैदिक शैली में निर्मित गलियारा। 10. पीछे की खिड़कियां और बंद दरवाजों का दृश्य। इतने विशाल खिड़की दरवाजे किसी राज-महल के कमरों के लिए बनते हैं।
उपरोक्त पुस्तक का संदर्भ देकर कहा गया है कि पृष्ठ सं. 1 में ओक कहते हैं कि ताजमहल प्रारंभ से ही बेगम मुमताज का मकबरा न होकर, एक हिंदू प्राचीन शिव मन्दिर है जिसे तब तेजो महालय कहा जाता था। अपने अनुसंधान के दौरान ओक ने खोजा कि इस शिव मंदिर को शाहजहां ने जयपुर के महाराज जयसिंह से अवैध तरीके से छीन लिया था और इस पर अपना कब्जा कर लिया था।
फिर भी जब तक सभी तथ्यों का साक्ष्यीकरण नहीं हो जाता तब तक किसी भी प्रस्तुति को प्रामाणिक नहीं माना जा सकता है। किन्तु ताजमहल के सर्वेक्षण करने को बल अवश्य मिलता है।

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