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अपने गांव की पुरानी संस्कृति को जिंदा रखने का प्रयास – ए एस इंटर कॉलेज मवाना

समर कैंप के अंतर्गत ए एस इंटर कॉलेज मवाना मेरठ में अपने गांव की पुरानी संस्कृति को जिंदा रखने का एक सूक्ष्म प्रयास किया जा रहा है जिसके अंतर्गत छात्र-छात्राओं को प्रतिदिन उन खेलों से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है

मवाना (संवादाता आरके विश्वकर्मा)। समर कैंप के अंतर्गत ए एस इंटर कॉलेज मवाना मेरठ में अपने गांव की पुरानी संस्कृति को जिंदा रखने का एक सूक्ष्म प्रयास किया जा रहा है जिसके अंतर्गत छात्र-छात्राओं को प्रतिदिन उन खेलों से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है जिन्हें हम लगातार भूलते चले जा रहे हैं आजकल के खेल में मोबाइल लैपटॉप वीडियो गेम इत्यादि हमारे जीवन का हिस्सा बन चुके हैं जबकि पुरानी संस्कृति में खेले जाने वाले खेल आजकल के बच्चे भूलते जा रहे हैं क्योंकि उन्हें कहीं वह माहौल नहीं मिलता है जहां पर अपनी संस्कृति को याद कर सकें
वे खेल जो हमें खूब भाते…
वे खेल जो हमें खूब भाते थे, लेकिन अब बस तस्वीरों में दिखते हैं, इसमें से आपका पसंदीदा कौन सा है ?
गुम हो गये बचपन के खेल।
बचपन के वे खेल जो हमें खूब भाते थे। ऐसा लगता था कि जैसे उन खेलों के लिए छुट्टियां आती थीं। लेकिन अब वो खेल कहां हैं ? आज के बच्चों को तो उन खेलों का नाम भी नहीं पता होगा। दोस्तों के साथ अक्कड़-बक्कड़ बम्बे बोल, छुपन-छुपाई, कबड्डी-कबड्डी, चोर-सिपाही, लब्बा डंगरिया, गिल्ली-डंडा जैसे तमाम खेल मौका मिलते ही खेलना शुरू कर देते थे। लेकिन अब यही खेल गुजरे जमाने के लगने लगे हैं।
समय के साथ हमारे बचपन के मायने भी बदल गये हैं। पहले दिन-दिन भर होने वाली धमाचौकड़ी, बच्चों का शोर शराबा करता झुण्ड और अल्हड़पन सब घर के आँगन तक सीमित हो गया है। वो खेल जिन्हें खेलकर तमाम पीढ़िया बड़ी हुई हैं अब वो खेल हमें तस्वीरों में नजर नजर आते हैं। अब गांव की चौपालों में बच्चों का न तो वो शोर सुनाई देता और न ही शहरों के पार्कों में बच्चे खेलते नजर आते हैं। अब इन खेलों को हम फेसबुक में पढ़कर या तस्वीरों में देखकर मुस्कुरा लेते हैं। गांव के खेलों का जिक्र होते ही कहते हैं, “बचपन में छुट्टियां होते ही गांव जाने के लिए तैयार हो जाते थे, क्योंकि अपने दोस्तों के साथ खूब खेलने को मिलता था। खूब मौज आती थी, अब के बच्चों को तो मोबाइल और टीवी देखने से ही फुर्सत नहीं मिलती, अगर थोड़ा बहुत समय मिला भी तो किताबों से भरे बैग ने उसे पूरा कर दिया।”

उन्होंने आगे कहा, “पुरानी यादों को ताजा करने के लिए अब तो एक ही गीत याद आता है ‘ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो, भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी, मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन, वो कागज की कश्ती वो बारिश का पानी।” अमरनाथ की तरह हमने और आपने भी अपने बचपन को मौज-मस्ती से जिया है लेकिन आज के बच्चों का बचपन और आउटडोर खेल इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों ने कहीं न कहीं छीना है।
ये सच है कि वक्त के साथ दुनिया बदलती है, विकास होता है, हमारी सोच और आदतें बदलती हैं, प्राथमिकताएं बदलती हैं…लेकिन इन बदली हुई प्राथमिकताओं में कई बार हम वो चीज़ें पीछे छूट जाती हैं, जो कभी हमारी ज़िंदगी का महत्वपूर्ण हिस्सा हुआ करती थीं… जैसे वो खेल जिनके साथ हम बड़े हुए हैं। पुराने समय के खिलौने की जगह अब मोबाइल, वीडियो गेम, कम्प्यूटर ने ले ली है।

कुछ याद आया आपको, बचपन का लंगड़ी टांग खेल आज छात्राओं ने यह खेल खेला
ज्यादातर यह खेल लड़कियां खेलती हैं, कई बार लड़के भी इस खेल का मजा लेने से पीछे नहीं हटते। इस खेल को हर जगह अलग-अलग तरीके से खेला जाता है जिसमें एक तरीका ये भी है। इस खेल को खेलने के लिए चौपाल या कहीं भी खुली जगह में नौ खाने बनाने होते हैं। तीन-तीन खानों की तीन लाइनें होती हैं। जो बीज का गोला होता है इसमें क्रास का निशाँ लगा देते हैं। पहले खाने से लेकर आठ खाने तक बारी-बारी खेलना पड़ता है।
खेल की शुरुआत पहले खाने से करते हैं, घर में फूटे मिट्टी के घड़े की एक गोल गुप्पल बनाते हैं। पहले खाने से लेकर उसे क्रास वाले खाने तक एक टांग से खड़े होकर सरकाना पड़ता है। जब क्रास वाले खाने में गुप्पल और खिलाड़ी दोनों पहुंच जाएं तो वहां दोनों पैर रख सकते हैं। इसके बाद उस गुप्पल हो एक पैर से इतनी तेज मारना पड़ता है जिससे वो उन नौ खानों के बाहर निकल जाए। इसके बाद खिलाड़ी को उस क्रास वाले खाने से फांदकर गुप्पल को पैरों से छूना होता है। तबी कहीं जाकर पहला राउंड पूरा होता है अगर इस दौरान ये गुप्पल किसी भी लाइन में छू गयी तो दूसरे खिलाड़ी को मौका मिलता है। इसमें दो या उससे अधिक खिलाड़ी खेल सकते हैं।

छात्रों ने खेला पिट्ठू खेल
एक समय था जब पिट्ठू का खेल बच्चों में बहुत लोकप्रिय हुआ करता था। इस खेल में दो टीमें होती हैं, एक बॉल होती है, और सात चपटे पत्थर, जिन्हें एक के ऊपर एक रख दिया जाता है। एक खिलाड़ी बॉल से पत्थरों को गिराता है। अब एक टीम का टास्क है कि वो इन पत्थरों को फिर से एक दूसरे के ऊपर रखे, और दूसरी टीम को बॉल मारकर इन्हें रोकना होता है।अगर पत्थर रखते समय खिलाड़ी को बॉल छू जाती है, तो वो खिलाड़ी खेल से आउट हो जाता है।

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